polio :-
स्वास्थ्य » पोलियो » पोलियो के लक्षण
पोलियो से बचने के लिए जानें क्या हैं इसके लक्षण
हमारे देश में ज्यादातर बच्चे पोलियो की समस्या से ग्रस्त हैं।
पोलियो के लक्षण में पेट में दर्द, मितली व उल्टी की समस्या हो सकती है।
पोलिय ड्रॉप की नियमित खुराक पिलाने से बच्चों को इस समस्या से बचाया जा सकता है।
जिस अंग में पोलियो के लक्षण पाए जाते हैं वो अंग काम करन बंद कर देता है।
पोलियो बहुत ही संक्रामक रोग है जो कि पोलियो विषाणु से छोटे बच्चों मे होता है। जिस अंग में यह बीमारी होती है वह काम करना बंद कर देता है। यह एक लाइलाज बीमारी है।
पोलियो की गंभीरता इसके लक्षणों पर आधारित रहती है:
स्पर्शोन्मुख : ज्यादातर लोग (लगभग (90% लोग , जो पोलियो वायरस से संक्रमित रहते हैं वे स्पर्शोन्मुख या बीमार नहीं रहते। अध्ययन के अनुसार स्पर्शोन्मुख बीमारी और लकवे की बीमारी के बीच का अनुपात 50-1000:1 होता है (सामान्य 200:1 होता है)
मामूली, गैर विशिष्ट: लगभग 4% से 8% लोगों को मामूली या गैर विशिष्ट बीमारी होती है। इसके लक्षण अन्य वायरल बीमारियों से अप्रभेद्य हो सकते हैं
जिनका वर्गीकरण निम्न रूप में किया जा सकता है:
ऊपरी श्वास पथ में संक्रमण: इस प्रकार के मामले में रोगी के गले में ख़राश और बुखार हो सकता है।
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण : इस समस्या में मिचली, उल्टी, पेट दर्द और कभी कभी कब्ज या दस्तके लक्षण दिख सकते हैं।
फ्लू जैसी बीमारी हो सकती है।
निम्न प्रकार के रोगी आमतौर पर एक सप्ताह में ठीक हो जाते हैं आर ऐसे लोगों का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित या संक्रमित होने से बच जाता है।
एसेप्टिक मेनिन्गितिस जो लकवाग्रस्त नहीं हैं: : लगभग 1 से 2% रोगियों बिना लकवा के एसेप्टिक मेनिन्गितिस से ग्रस्त होते हैं। मरीज को शुरू में गैर विशिष्ट प्रोड्रोम हो सकता है उसके बाद गर्दन, पीठ या पैरों में जकड़न हो सकता है। ये सब लक्षण 2 से 10 दिनों तक रह सकते हैं उसके बाद मरीज को पूरी तरह आराम मिल जाता है।
झूलता हुआ पक्षाघात: पोलियो संक्रमण के रोगियों में से सिर्फ 1% हीं फ्लेसीड पक्षाघात के शिकार होते हैं। शुरुआत में मरीज को गैर विशिष्ट प्रोड्रोमल लक्षण हो सकते हैं जिनके बाद पक्षाघात के लक्षण उभरने लगते हैं। पक्षाघात आम तौर पर 2 से अधिक 3 दिनों तक प्रगति करता जाता है और एक बार बुखार नियंत्रित हो जाने पर वह स्थिर हो जाता है। पक्षाघात पोलियो के साथ रोगियों में;
पारालाईटिक पोलिओ के लगभग 50% रोगी पूरी तरह से ठीक हो सकते हैं और फिर उनमें किसी भी तरह का अवशिष्ट लकवा का अंश नहीं रह जाता।
लगभग 25% रोगियों में हल्के रूप का स्थायी पक्षाघात और विकलांगता हो सकता है।
और लगभग 25% रोगियों को गंभीर रूप से स्थायी विकलांगता और पक्षाघात हो सकता है।
झोले के मारे पोलियो से ग्रस्त बच्चों की मृत्यु की दर 2% से 5% के बीच में रहती है। वयस्कों में मृत्यु दर बहुत अधिक रहती है जो 15% से 30% तक जा सकती है
भारतीय बोझ
ज्यादा दिन पहले की बात नहीं है, 1998 को हीं ले लीजिये; उस समय तक दुनिया भर में 125 से भी ज्यादा देश पोलियो के लिए स्थानिकमारी वाले देश थे यानि वहां पोलिओ के मरीज पाए जाते थे। इस अवधि में 1000 से भी अधिक बच्चे रोजाना पक्षाघात के शिकार होते रहते थे। लेकिन उसके बाद व्यापक रूप से पोलियो उन्मूलन का कार्य चलता रहा जिसकी वजह से लगभग 100 से भी अधिक देशों में पोलिओ के संचरण को बाधित कर दिया गया यानि कि इसके फैलने पर नियंत्रण पा लिया गया। 2004 के मध्य से केवल छह देशों में हीं जंगली पोलिओ रह गया। वे छह देश हैं: नाइजीरिया, पाकिस्तान, भारत, नाइजर, अफगानिस्तान और मिस्र।
हालांकि भारत से पोलियो उन्मूलन के कई उपाय किये गए हैं फिर भी यह कई जगह विराजमान है। भारत में पोलियो के ज्यादातर मामले उत्तर प्रदेश और बिहार में पाए जाते हैं।
अक्टूबर 2009 तक उत्तर प्रदेश और बिहार से पोलिओ के 464 मामले प्रकाश में आये थे। उत्तर प्रदेश के 80% मामले पश्चिमी भाग के 10 जिलों पाए गए थे और बिहार के कोसी नदी के पास वाले क्षेत्रों में से ( 6 जिलों में से) 85% मामले पाए गए थे।
वर्तमान में भारत में पोलियो के सबसे ज्यादा कारण टाइप 1 और टाइप 3 वायरस के कारण होते हैं। । 2009 में, पोलियो के ज्यादातर मामले (66 प्रतिशत पोलिओ के मामले ) दो साल से कम उम्र के बच्चों में पाए गए।
बच्चों में पोलियो से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब:-
पोलियो की दवा पांच वर्ष के हर बच्चे को पिलायी जानी चाहिए।
भले ही बच्चा बीमार हो, लेकिन उसे हर हाल में दवा पिलानी चाहिए।
लगातार तीसरे वर्ष भारत में पोलियो का कोई मामला सामने नहीं आया।
पोलियो का सुरक्षा चक्र बनाए रखने के लिए जरूरी है कि कोई बच्चा छूटने न पाए।
यह (2013) लगातार तीसरा ऐसा वर्ष है, जब भारत में पोलियो का एक भी मामला सामने नहीं आया है। लेकिन, हमारी जरा सी गलती इस तस्वीर को पलट सकती है। याद रखिए पोलियो तभी तक हमसे दूर है, जब तक हमने इसे अपने से दूर रखा हुआ है।

बच्चों में पोलियो
पोलियो वायरस छोटे बच्चों में अधिक फैलता है और यह मुख्यत: बच्चे के पैरों को प्रभावित करता है। लेकिन यह शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकता है। यह बीमारी छोटे बच्चों में अधिक होती है इसलिए इसे शिशुओं का लकवा या बाल पक्षाघात भी कहा जाता है।
बच्चों में पोलियो से संबंधी सवाल-जवाब
1. क्या पोलियो ड्रॉप पिलाने से बच्चा पूरी तरह से पोलियो के संक्रमण से सुरक्षित हो जाता है?
बच्चों को पोलियो से बचाने के लिए (ओपीवी) ओरल पोलियो वैक्सीन दिया जाता है। इस दवा के बाद बच्चा पूरी तरह से पोलियो से सुरक्षित हो जाता है। लेकिन आज भी हमारे समाज में इस दवा के प्रति लोगों में कई प्रकार की भ्रांतियां मौजूद हैं। जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है।
2. अगर किसी बच्चे का दस्त हो रहा है या उल्टियां आ रही हैं, तो क्या उसे पोलियो ड्राप पिलानी चाहिए?
बच्चे को किसी भी स्थिति में पोलियो ड्राप पिलाई जा सकती है। कई लोग ऐसा मानते हैं कि अगर बच्चा बीमार है या उसे उल्टी अथवा दस्त की शिकायत है, तो ऐसी सूरत में उसे दवा नहीं पिलायी जानी चाहिए। जबकि वास्तविकता यह है कि इन सबका पोलियो की दवा से कोई लेना-देना है। तो अगली बार जब भी आपके घर पोलिया की दवा पिलाने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ता आएं तो पांच वर्ष से कम उम्र के अपने बच्चे को यह दवा जरूर पिलाएं।
3. नवजात शिशु को पोलियो ड्राप दी जानी चाहिए या नहीं?
नवजात शिशु के लिए भी पोलियो की खुराक उतनी ही जरूरी है, जितनी कुछ महीने या कुछ साल के बच्चे के लिए। नवजात को पोलियो की दवा पिलाने का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। यह दवा बच्चे को दी जा रही अन्य दवाओं और उसे लग रहे इंजेक्शन से अलग होती है और हर परिस्थिति में उसे दी जानी चाहिए।
4. क्या पोलियो से हमेशा पक्षाघात होता है?
पोलियो वायरस से प्रभावित बहुत कम बच्चों में ही पक्षाघात होता है। लेकिन, पोलियो इसके बावजूद एक ऐसा रोग है, जो आपके बच्चे को जीवन भर की अपंगता दे सकता है। आपको चाहिए कि आप अपने बच्चे को सही समय पर पोलियो की खुराक जरूर पिलायें।
5. ज्यादातर बच्चे ही पोलियो के शिकार क्यों होते हें?
बच्चे पोलियो के शिकार इसलिए होते हैं क्योंकि उनकी प्रतिरोधी क्षमता कमजोर होती है। और उन बच्चों के मां बाप उन्हें तमाम भ्रांतियों का शिकार होकर उन्हें पोलियो की दवा भी नहीं पिलाते। हालांकि भारत ने काफी हद तक इस बीमारी पर काबू पा लिया है, लेकिन फिर भी यदि एक बच्चा भी इस सुरक्षा चक्र से बाहर रह जाता है, तो बाकी बच्चों के लिए भी खतरा बना रहता है।
6. अगर कोई बच्चा 6 से 7 बार पोलियो ड्राप ले चुका है, तो क्या उसे पोलियो ड्राप पिलानी चाहिए?
किसी बच्चे ने 6 से 7 बार पोलियो ड्राप पी है, तो भी पोलियो उसे पोलियो ड्राप पिलाने में कोई हर्ज नहीं। याद रखिए, चाहे बच्चा कितनी ही बार पोलियो की दवा पी चुका हो, लेकिन पांच वर्ष की उम्र तक उसे हर बार पोलियो की 'दो बूंद जिंदगी' की जरूर पिलानी चाहिए। इससे बच्चे को लाभ ही होगा व किसी प्रकार की कोई हानि नहीं होगी।
7. पोलियो टीकाकरण कैसे कराया जाना चाहिए?
बच्चे के जन्म पर, छठे, दसवें व चौदहवें सप्ताह में टीकाकरण करवाना चाहिए और 16 से 24 महीने की आयु में बूस्टर डोज दी जानी चाहिए। इसके अलावा जब भी सरकार द्वारा पोलियो अभियान चलाया जाए, तो अपने बच्चे को पोलियो की दवा जरूर पिलानी चाहिए।
पोलियोमेलाइटिस:-
विश्व पोलियो दिवस 24 अक्टूबर का ध्येय है, ‘पोलियो बीमारी’ का जड़ से खात्मा। पोलियो का आक्रमण किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन सामान्यत: यह वायरस 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करता है।
‘पोलियो बीमारी’ को पोलियोमाइलाइटिस या शिशु अंगघात भी कहा जाता है, यह ऐसी बीमारी है, जिससे कई राष्ट्र बुरी तरह से प्रभावित हो चुके हैं। हालांकि विश्व के अधिकतर देशों से पोलियो का खात्मा पूरी तरह से हो चुका है, लेकिन अभी भी विश्व के कई देशों से यह बीमारी जड़ से खत्म नहीं हो पायी है।
पोलियो क्या है:
पोलियोमेलाइटिस अथवा पोलियो एक संक्रामक रोग है, जो वायरस के द्वारा फैलता है। यह लक्षण सामान्य से तीव्र हो सकते हैं और इसमें आम तौर पर टांगों में लकवा हो जाता है।
यह संक्रमण कैसे हो सकता है:
पोलियो वायरस मुंह के रास्ते शरीर में प्रविष्ठ होता है और आंतों को प्रभावित करता है। वायरय के शरीर में प्रवेश करने के कुछ ही घंटों बाद इससे पक्षाघात तक हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि यह लक्षण 3 से 5 दिनों में प्रदर्शित हों।
पोलियो के लक्षण:
पेटदर्द, बुखार, थकान, सरदर्द पोलियो के सामान्य लक्षण हैं, जटिल स्थितियों में पोलियो के कारण तेज़ बुखार, मेनिनजाइटिस, गर्दन या पीठ में अकड़न, पक्षाघात, निगलने में कठिनाई जैसी स्थिति हो सकती है।
पोलियो निवारण :
अब तक पोलियो का कोई इलाज नहीं है, लेकिन पोलियो वैक्सीन देकर आप अपने बच्चेय को हमेशा के लिए पोलियो से बचा सकते हैं। बचपन में पोलियो ड्राप देने के बाद आपका बच्चा पूरी तरह से पोलियो से सुरक्षित हो जायेगा और उसमें पोलियो के कारण पक्षाघात होने की भी संभावना खत्म हो जायेगी।
स्वास्थ्य » पोलियो » पोलियो के लक्षण
पोलियो से बचने के लिए जानें क्या हैं इसके लक्षण
हमारे देश में ज्यादातर बच्चे पोलियो की समस्या से ग्रस्त हैं।
पोलियो के लक्षण में पेट में दर्द, मितली व उल्टी की समस्या हो सकती है।
पोलिय ड्रॉप की नियमित खुराक पिलाने से बच्चों को इस समस्या से बचाया जा सकता है।
जिस अंग में पोलियो के लक्षण पाए जाते हैं वो अंग काम करन बंद कर देता है।
पोलियो बहुत ही संक्रामक रोग है जो कि पोलियो विषाणु से छोटे बच्चों मे होता है। जिस अंग में यह बीमारी होती है वह काम करना बंद कर देता है। यह एक लाइलाज बीमारी है।
पोलियो की गंभीरता इसके लक्षणों पर आधारित रहती है:
स्पर्शोन्मुख : ज्यादातर लोग (लगभग (90% लोग , जो पोलियो वायरस से संक्रमित रहते हैं वे स्पर्शोन्मुख या बीमार नहीं रहते। अध्ययन के अनुसार स्पर्शोन्मुख बीमारी और लकवे की बीमारी के बीच का अनुपात 50-1000:1 होता है (सामान्य 200:1 होता है)
मामूली, गैर विशिष्ट: लगभग 4% से 8% लोगों को मामूली या गैर विशिष्ट बीमारी होती है। इसके लक्षण अन्य वायरल बीमारियों से अप्रभेद्य हो सकते हैं
जिनका वर्गीकरण निम्न रूप में किया जा सकता है:
ऊपरी श्वास पथ में संक्रमण: इस प्रकार के मामले में रोगी के गले में ख़राश और बुखार हो सकता है।
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण : इस समस्या में मिचली, उल्टी, पेट दर्द और कभी कभी कब्ज या दस्तके लक्षण दिख सकते हैं।
फ्लू जैसी बीमारी हो सकती है।
निम्न प्रकार के रोगी आमतौर पर एक सप्ताह में ठीक हो जाते हैं आर ऐसे लोगों का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित या संक्रमित होने से बच जाता है।
एसेप्टिक मेनिन्गितिस जो लकवाग्रस्त नहीं हैं: : लगभग 1 से 2% रोगियों बिना लकवा के एसेप्टिक मेनिन्गितिस से ग्रस्त होते हैं। मरीज को शुरू में गैर विशिष्ट प्रोड्रोम हो सकता है उसके बाद गर्दन, पीठ या पैरों में जकड़न हो सकता है। ये सब लक्षण 2 से 10 दिनों तक रह सकते हैं उसके बाद मरीज को पूरी तरह आराम मिल जाता है।
झूलता हुआ पक्षाघात: पोलियो संक्रमण के रोगियों में से सिर्फ 1% हीं फ्लेसीड पक्षाघात के शिकार होते हैं। शुरुआत में मरीज को गैर विशिष्ट प्रोड्रोमल लक्षण हो सकते हैं जिनके बाद पक्षाघात के लक्षण उभरने लगते हैं। पक्षाघात आम तौर पर 2 से अधिक 3 दिनों तक प्रगति करता जाता है और एक बार बुखार नियंत्रित हो जाने पर वह स्थिर हो जाता है। पक्षाघात पोलियो के साथ रोगियों में;
पारालाईटिक पोलिओ के लगभग 50% रोगी पूरी तरह से ठीक हो सकते हैं और फिर उनमें किसी भी तरह का अवशिष्ट लकवा का अंश नहीं रह जाता।
लगभग 25% रोगियों में हल्के रूप का स्थायी पक्षाघात और विकलांगता हो सकता है।
और लगभग 25% रोगियों को गंभीर रूप से स्थायी विकलांगता और पक्षाघात हो सकता है।
झोले के मारे पोलियो से ग्रस्त बच्चों की मृत्यु की दर 2% से 5% के बीच में रहती है। वयस्कों में मृत्यु दर बहुत अधिक रहती है जो 15% से 30% तक जा सकती है
भारतीय बोझ
ज्यादा दिन पहले की बात नहीं है, 1998 को हीं ले लीजिये; उस समय तक दुनिया भर में 125 से भी ज्यादा देश पोलियो के लिए स्थानिकमारी वाले देश थे यानि वहां पोलिओ के मरीज पाए जाते थे। इस अवधि में 1000 से भी अधिक बच्चे रोजाना पक्षाघात के शिकार होते रहते थे। लेकिन उसके बाद व्यापक रूप से पोलियो उन्मूलन का कार्य चलता रहा जिसकी वजह से लगभग 100 से भी अधिक देशों में पोलिओ के संचरण को बाधित कर दिया गया यानि कि इसके फैलने पर नियंत्रण पा लिया गया। 2004 के मध्य से केवल छह देशों में हीं जंगली पोलिओ रह गया। वे छह देश हैं: नाइजीरिया, पाकिस्तान, भारत, नाइजर, अफगानिस्तान और मिस्र।
हालांकि भारत से पोलियो उन्मूलन के कई उपाय किये गए हैं फिर भी यह कई जगह विराजमान है। भारत में पोलियो के ज्यादातर मामले उत्तर प्रदेश और बिहार में पाए जाते हैं।
अक्टूबर 2009 तक उत्तर प्रदेश और बिहार से पोलिओ के 464 मामले प्रकाश में आये थे। उत्तर प्रदेश के 80% मामले पश्चिमी भाग के 10 जिलों पाए गए थे और बिहार के कोसी नदी के पास वाले क्षेत्रों में से ( 6 जिलों में से) 85% मामले पाए गए थे।
वर्तमान में भारत में पोलियो के सबसे ज्यादा कारण टाइप 1 और टाइप 3 वायरस के कारण होते हैं। । 2009 में, पोलियो के ज्यादातर मामले (66 प्रतिशत पोलिओ के मामले ) दो साल से कम उम्र के बच्चों में पाए गए।
बच्चों में पोलियो से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब:-
पोलियो की दवा पांच वर्ष के हर बच्चे को पिलायी जानी चाहिए।
भले ही बच्चा बीमार हो, लेकिन उसे हर हाल में दवा पिलानी चाहिए।
लगातार तीसरे वर्ष भारत में पोलियो का कोई मामला सामने नहीं आया।
पोलियो का सुरक्षा चक्र बनाए रखने के लिए जरूरी है कि कोई बच्चा छूटने न पाए।
यह (2013) लगातार तीसरा ऐसा वर्ष है, जब भारत में पोलियो का एक भी मामला सामने नहीं आया है। लेकिन, हमारी जरा सी गलती इस तस्वीर को पलट सकती है। याद रखिए पोलियो तभी तक हमसे दूर है, जब तक हमने इसे अपने से दूर रखा हुआ है।
बच्चों में पोलियो
पोलियो वायरस छोटे बच्चों में अधिक फैलता है और यह मुख्यत: बच्चे के पैरों को प्रभावित करता है। लेकिन यह शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकता है। यह बीमारी छोटे बच्चों में अधिक होती है इसलिए इसे शिशुओं का लकवा या बाल पक्षाघात भी कहा जाता है।
बच्चों में पोलियो से संबंधी सवाल-जवाब
1. क्या पोलियो ड्रॉप पिलाने से बच्चा पूरी तरह से पोलियो के संक्रमण से सुरक्षित हो जाता है?
बच्चों को पोलियो से बचाने के लिए (ओपीवी) ओरल पोलियो वैक्सीन दिया जाता है। इस दवा के बाद बच्चा पूरी तरह से पोलियो से सुरक्षित हो जाता है। लेकिन आज भी हमारे समाज में इस दवा के प्रति लोगों में कई प्रकार की भ्रांतियां मौजूद हैं। जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है।
2. अगर किसी बच्चे का दस्त हो रहा है या उल्टियां आ रही हैं, तो क्या उसे पोलियो ड्राप पिलानी चाहिए?
बच्चे को किसी भी स्थिति में पोलियो ड्राप पिलाई जा सकती है। कई लोग ऐसा मानते हैं कि अगर बच्चा बीमार है या उसे उल्टी अथवा दस्त की शिकायत है, तो ऐसी सूरत में उसे दवा नहीं पिलायी जानी चाहिए। जबकि वास्तविकता यह है कि इन सबका पोलियो की दवा से कोई लेना-देना है। तो अगली बार जब भी आपके घर पोलिया की दवा पिलाने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ता आएं तो पांच वर्ष से कम उम्र के अपने बच्चे को यह दवा जरूर पिलाएं।
3. नवजात शिशु को पोलियो ड्राप दी जानी चाहिए या नहीं?
नवजात शिशु के लिए भी पोलियो की खुराक उतनी ही जरूरी है, जितनी कुछ महीने या कुछ साल के बच्चे के लिए। नवजात को पोलियो की दवा पिलाने का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। यह दवा बच्चे को दी जा रही अन्य दवाओं और उसे लग रहे इंजेक्शन से अलग होती है और हर परिस्थिति में उसे दी जानी चाहिए।
4. क्या पोलियो से हमेशा पक्षाघात होता है?
पोलियो वायरस से प्रभावित बहुत कम बच्चों में ही पक्षाघात होता है। लेकिन, पोलियो इसके बावजूद एक ऐसा रोग है, जो आपके बच्चे को जीवन भर की अपंगता दे सकता है। आपको चाहिए कि आप अपने बच्चे को सही समय पर पोलियो की खुराक जरूर पिलायें।
5. ज्यादातर बच्चे ही पोलियो के शिकार क्यों होते हें?
बच्चे पोलियो के शिकार इसलिए होते हैं क्योंकि उनकी प्रतिरोधी क्षमता कमजोर होती है। और उन बच्चों के मां बाप उन्हें तमाम भ्रांतियों का शिकार होकर उन्हें पोलियो की दवा भी नहीं पिलाते। हालांकि भारत ने काफी हद तक इस बीमारी पर काबू पा लिया है, लेकिन फिर भी यदि एक बच्चा भी इस सुरक्षा चक्र से बाहर रह जाता है, तो बाकी बच्चों के लिए भी खतरा बना रहता है।
6. अगर कोई बच्चा 6 से 7 बार पोलियो ड्राप ले चुका है, तो क्या उसे पोलियो ड्राप पिलानी चाहिए?
किसी बच्चे ने 6 से 7 बार पोलियो ड्राप पी है, तो भी पोलियो उसे पोलियो ड्राप पिलाने में कोई हर्ज नहीं। याद रखिए, चाहे बच्चा कितनी ही बार पोलियो की दवा पी चुका हो, लेकिन पांच वर्ष की उम्र तक उसे हर बार पोलियो की 'दो बूंद जिंदगी' की जरूर पिलानी चाहिए। इससे बच्चे को लाभ ही होगा व किसी प्रकार की कोई हानि नहीं होगी।
7. पोलियो टीकाकरण कैसे कराया जाना चाहिए?
बच्चे के जन्म पर, छठे, दसवें व चौदहवें सप्ताह में टीकाकरण करवाना चाहिए और 16 से 24 महीने की आयु में बूस्टर डोज दी जानी चाहिए। इसके अलावा जब भी सरकार द्वारा पोलियो अभियान चलाया जाए, तो अपने बच्चे को पोलियो की दवा जरूर पिलानी चाहिए।
पोलियोमेलाइटिस:-
विश्व पोलियो दिवस 24 अक्टूबर का ध्येय है, ‘पोलियो बीमारी’ का जड़ से खात्मा। पोलियो का आक्रमण किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन सामान्यत: यह वायरस 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करता है।
‘पोलियो बीमारी’ को पोलियोमाइलाइटिस या शिशु अंगघात भी कहा जाता है, यह ऐसी बीमारी है, जिससे कई राष्ट्र बुरी तरह से प्रभावित हो चुके हैं। हालांकि विश्व के अधिकतर देशों से पोलियो का खात्मा पूरी तरह से हो चुका है, लेकिन अभी भी विश्व के कई देशों से यह बीमारी जड़ से खत्म नहीं हो पायी है।
पोलियो क्या है:
पोलियोमेलाइटिस अथवा पोलियो एक संक्रामक रोग है, जो वायरस के द्वारा फैलता है। यह लक्षण सामान्य से तीव्र हो सकते हैं और इसमें आम तौर पर टांगों में लकवा हो जाता है।
यह संक्रमण कैसे हो सकता है:
पोलियो वायरस मुंह के रास्ते शरीर में प्रविष्ठ होता है और आंतों को प्रभावित करता है। वायरय के शरीर में प्रवेश करने के कुछ ही घंटों बाद इससे पक्षाघात तक हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि यह लक्षण 3 से 5 दिनों में प्रदर्शित हों।
पोलियो के लक्षण:
पेटदर्द, बुखार, थकान, सरदर्द पोलियो के सामान्य लक्षण हैं, जटिल स्थितियों में पोलियो के कारण तेज़ बुखार, मेनिनजाइटिस, गर्दन या पीठ में अकड़न, पक्षाघात, निगलने में कठिनाई जैसी स्थिति हो सकती है।
पोलियो निवारण :
अब तक पोलियो का कोई इलाज नहीं है, लेकिन पोलियो वैक्सीन देकर आप अपने बच्चेय को हमेशा के लिए पोलियो से बचा सकते हैं। बचपन में पोलियो ड्राप देने के बाद आपका बच्चा पूरी तरह से पोलियो से सुरक्षित हो जायेगा और उसमें पोलियो के कारण पक्षाघात होने की भी संभावना खत्म हो जायेगी।

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