Tuesday, 28 January 2014

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Food Paijhning


Food Paijhning:-

जीवनरक्षक घोल है ओआरएस

ओरल रिहाइड्रेशन साल्ट्स  (ओआरएस), डिहाइड्रेशन यानी निर्जलीकरण को दूर करने का एक किफायती और प्रभावशाली उपाय है। इसके जरिये शरीर को इलेक्ट्रॉल्स, ग्लूजकोज और जल की पर्याप्‍त मात्रा मिलती है।

ओआरएस घोल
दस्त लगने पर शिशुओं के लिए ओआरएस किसी संजीवनी से कम नहीं। इससे बच्चों का दस्त ठीक हो जाता है। डायरिया की चपेट में आने वाले बच्चों को बिना चिकित्सकीय सलाह के भी ओआरएस का घोल दिया जा सकता है। ऐसा करने से बच्चों के शरीर में पानी की कमी नहीं होती। इसके कारण बच्चों की तबियत बहुत ज्यादा बिगड़ने से भी बच सकती है। याद रखिए देर करने से बच्चे की जान पर बन सकती है।

अक्सर हम बच्चे को दस्त लगने पर उसे दवा खिलाने लगते हैं। जबकि कई बार इसकी जरूरत भी नहीं होती। जानकार भी मानते हैं कि अधिकांश मामलों में डायरिया तीन-चार दिनों में केवल ओआरएस व जिंक के घोल से ही ठीक हो जाता है। अगर डॉम्‍क्‍टर कोई दवा लिखता है, तो ठीक, वरना खुद से न दवा लिखवाएं और न ही अपने से कोई दवा बच्चे को खिलाएं।

बच्चे को दस्त के दुष्प्राभावों से बचाने के लिए सबसे जरूरी चीज है अभिभावकों में जागरुकता। अगर अभिभावक सही समय पर सही फैसला ले लेंगे तो बच्चे की कीमती जान बचायी जा सकेगी। दुनिया में केवल 40 फीसदी बच्चों को ही डा‍यरिया का सही इलाज मिल पाता है।

ऐसा नहीं है कि केवल गरीब अथवा विकासशील देशों में ही डायरिया एक गंभीर बीमारी है, बल्कि विकसित देशों में इसे निमोनिया के बाद दूसरी सबसे खतरनाक बीमारी माना जाता है। डायरिया से बचने के लिए ओआरएस एक बेहद प्रभावी तरीका है।

ओआरएस
विश्‍व स्वास्‍थय संगठन ने वर्ष 1978 में घर पर उपलब्ध सामान से ही ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी यानी ओआरटी और ओआरएस की शुरुआत की। इस इलाज ने डायरिया से होने वाली मौतों की संख्या में कमी ला दी है। ओआरएस के आने से पहले जहां हर वर्ष 50 लाख लोग डायरिया के चलते अपनी जान गवांते थे, वहीं अब यह आंकड़ा कम होकर 15 लाख हो गया है। अपनी उपयोगिता के लिए ओआरएस को दुनिया भर में सराहा जाता है। इसे इस सदी की सबसे बड़ी चिकित्सीय उपलब्धि भी माना जाता है।

डॉक्टर के पास कब जाएं
डायरिया यूं तो तीन-चार दिन में ठीक हो जाता है। अगर ऐसा न हो, तो फिर डॉक्टर के पास जाना चाहिए। इसके साथ ही अगर डायरिया बढ़ जाए या दस्त के साथ खून आए तो भी डॉक्टर के पास जरूर जाना चाहिए। अगर बच्‍चे को दस्‍त के साथ लगातार उल्टियां भी हो रही हों, तो भी आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। दस्त के सा‍थ ही बच्चे को तेज बुखार और थकान भी हो रही हो, तो यह वक्‍त है कि आप उसे डॉक्टर के पास ले जाएं। बच्‍चे को यदि बहुत ज्यादा प्यास लग रही हो, तो भी बिना देर किए उसे चिकित्सीय सहायता दिलायी जाए।

कब करें ओआरएस का इस्‍तेमाल
अगर बच्‍चे को दिन में तीन या उससे ज्‍यादा बार दस्‍त आएं तो उसे ओआरएस देना शुरू कर देना चाहिए। अगर बच्‍चे की उम्र छह महीने या उससे अधिक है तो उसे 20 मिलीग्राम जिंक रोजाना दिया जा सकता है। यह गोली अथवा सिरप किसी भी रूप में हो सकता है। बच्‍चे को करीब डेढ़ से दो सप्‍ताह तक यह गोलियां अथवा सिरप दिया जा सकता है। अगर बच्‍चे की उम्र छह महीने से कम है तो 10 मिलीग्राम जिंक दिया जा सकता है।

कैसे करें ओआरएस तैयार
ओआरएस तैयार करने से पहले साबुन से अच्‍छी तरह अपने हाथ धो लें।
ओआरएस घोल तैयार करने से पहले पैकेट पर लिखे दिशा-निर्देशों को अच्‍छी तरह पढ़ लें।
 एक साफ बर्तन में ओआरएस पैकेट डालें।
 फिर उसमें पर्याप्‍त मात्रा में साफ पानी डालें। अगर आप पानी की उचित मात्रा नहीं डालेंगे तो इससे डायरिया का दुष्‍प्रभाव बढ़ सकता है।
 ओआरएस घोल को केवल पानी में ही तैयार करें। दूध, सूप, फलों के रस और सॉफ्ट ड्रिंक के साथ इसका सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही इसमें अतिरिक्‍त चीनी भी नहीं मिलानी चाहिए।
 इस घोल को अच्‍छी तरह मिलाने के बाद एक साफ कप से बच्‍चे को पिलाएं। बोतल से इस घोल को नहीं पिलाना चाहिए।
 अगर बच्‍चा इसे पीकर उल्‍टी कर देता है तो थोड़ी देर रुककर उसे एक बार फिर ओआरएस दें।
अभिभावकों को अपने बच्‍चे को ओआरएस पीने के लिए प्रोत्‍साहित करना चाहिए। दो वर्ष से कम उम्र के बच्‍चों को दस्‍त के बाद कम से कम 75 से 125 मिलीलिटर ओआरएस घोल लेना चाहिए। वहीं दो वर्ष से अधिक आयु के बच्‍चे को 125 से 250 मिलि. घोल रोजाना लेना चाहिए।

हैजा रोग में क्या खाएं
हैजा में खाने पीने का विशेष ध्यान रखना होता है। खान पान में सावधानियां नहीं बरतने पर यह बिमारी दोबारा अटैक कर सकती है।। दूषित पानी व खाने से फैलने वाला यह रोग आपकी आंतों में होता है। महामारी के दौरान इस रोग के फैलने की ज्यादा संभावना होती है। इस रोग के जीवाणु आंत की आन्तरिक लाइनिंग पर आक्रमण करता है जिससे आपके अंदर हैजा के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। आईए जानें हैजा में कैसा हो आपका खान पान।

उबला पानी पीएं
हैजा के इलाज के दौरान उबला हुआ पानी ही पिएं या फिर क्लोरीन या आयोडीन युक्त पानी भी पी सकते हैं। पानी में बर्फ का इस्तेमाल नहीं करें क्योंकि हैजा के बैक्टैरिया ठंडी जगहों पर ही होते हैं।

ताजा खाना खाएं
हैजा में ताजा बना हुआ खाना ही खाएं। कच्ची सब्जियां खाने से बचें। खासकर सलाद खाने से पहले उसे अच्छे से धो लें। फलों को भी खाने से पहले अच्छी तरह से धो लें और छिलका उतार कर काट कर खाएं।

नमक-चीनी का घोल लें
हैजा के दौरान शरीर में पानी की कमी हो जाती है इसलिए रोगी को थोड़ी-थोड़ी दर में नमक-शकर-पानी का घोल देना चाहिए या बना बनाया इलेक्ट्रोलाइट पिलाकर रोगी को लवणों की पूर्ति की जाती है।

शिकंजी पिएं
हैजा अगर शुरुआती अवस्था में है तो एक गिलास पानी में एक नींबू निचोड़ कर इसमें एक चम्मच पिसी मिश्री मिलाकर शिकंजी बना लें और रोज पिएं। इससे हैजा के बैक्टेरिया खत्म हो जाते हैं।

 बाहर का खाना नहीं खाएं
बाहर के खाने में मक्खियां बार-बार बैठती है जिससे उनके पैरों पर लगे जीवाणु खाने वाली चीजों पर लग जाते हैं इसलिए हैजा के दौरान बाहर का खाना नहीं खाना चाहिए। 

सावधानियां
अधिक शारीरिक या मानसिक थकान और तापमान में जल्दी-जल्दी बदलाव से बचें।
    कोई भी तरल पदार्थ बिना उबाले हुए न पियें। शौचालय से आने के बाद हाथ को साबुन से अच्छे से धोएं।
    घर के सभी बर्तनों को अच्छे से गर्म पानी से साफ करें।
    भोजन करने से पहले हाथ धोना कभी नहीं भूले। पानी में कार्बोलिक एसिड मिला कर हाथ धोएं।
    जहां तक संभव हो, हर बार साफ तौलिये का इस्तेमाल करें। महामारी वाली जगहों पर जाने से बचें। अगर जाना जरुरी हो तो मुंह पर मास्क लगाकर जाएं।
    घर के आसपास साफ सफाई रखें।। नालियों व गड्ढों को ढ़क दें।


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